StatCounter

Monday, August 22, 2016

इस वीकेंड की मूवी थी Happay Bhag Jaayegi. मुझसे किसी ने पुछा कि कैसी थी मूवी? अब हम सभी जानते हैं कि सवाल में दम तो जवाब से आता है।

और वैसे देखा जाए तो लोग जितनी आसानी से ये सवाल पूछ लेते हैं कि कैसी है फिल्म, कभी कभी मुझे शक़ होता है कि वो जानते भी हैं या इतने नादान हैं कि ये भी नहीं जानते कि ये बताना कि "कैसी थी मूवी थी " अपने आप में एक धंधा है।  मतलब भाइयों इससे लोगों कि रोजी रोटी चलती हैं। ऐसे हीं सड़क में खड़े होके बोल देने वाली चीज़ नहीं है चाट टाइप से कि "अच्छा है"।    

बीच में तो इस सवाल के जवाब में कि कैसी थी मूवी, मैंने बोलना शुरू कर दिया था दो स्टार है या तीन स्टार हैं, लेकिन मुझे शक़ हुआ कि लोग शायद जान हीं नहीं रहें हैं कि मैं क्या बोल रहा हूँ. वैसे तो प्रोफेसर होने के नाते मैं इस बात का आदी हूँ कि मैं बोलू और लोग न समझे, पर फिर भी हम बोलना तो छोड़तें नहीं।

मतलब लोग शायद रिव्यु पढ़तें हीं नहीं हैं या और खुल के बोलूं तो शायद उन्हें पता भी न हो कि रिव्यु होता है, भरसक उन्होंने कभी रिव्यु पढ़ा भी नहीं हो। हालाँकि अभी भी इतने अज्ञानी लोग हो ऐसा संभव नहीं है।

लेकिन अगर बैठे बैठे आप आस पास रिसर्च (मैं रिसर्च शब्द का बहुत हीं गन्दा इस्तेमाल कर रहा हूँ, कृपया माफ़ कर दे ) करें, तो शायद आप पाएंगे कि आपके आस पास बहुत सारे लोग वैसे होंगे जिन्होंने सही में कभी भी कोई मूवी रिव्यु, अब आगे से मैं समीक्षा बोलूंगा, पढ़ा हीं नहीं होगा।

बहुत आश्चर्य कि बात नही हैं है क्योंकि रिव्यु न्यूज़पेपर में शनिवार को आता है और संडे को स्कूल बंद रहता है, तो बहुत सारे लोग जिनको स्कूल के कारण न्यूज़पेपर पढ़ने की आदत है या थी, वो लोग तो ऐसे हीं साफ़ हो गए। फिर सिनेमा भारत में अपने आप में पढ़ाई का विलोम शब्द माना जाता हैं, जैसे कि उपन्यास कोर्स की किताब का, ऐसे में फिर बहुत कम हीं लोगों होंगे जिनके घर में फिल्म पत्रिकाएं आती होगी। अपने नानीघर के अलावा मैंने अपने आस पास तो नहीं हीं देखा है।

नानीघर जाने एक उत्साह यह भी होता था कि पुरानी फिल्म पत्रिकाएं पढ़ने को मिलेगी। फ़िल्मी पत्रिकाओ  कि एक अपनी दुनिया है। जहाँ तक मुझे लगता है कि फ़िल्मी पत्रिकाएं सबसे ज्यादा बिकने वाली पत्रिकाओं में होंगी, मगर फिल्म पत्रिकाओं पर फिर कभी।

अभी Happy Bhag Jaayegi...

तो मैंने बोला कि अगर कभी कभी मूवी देखते हो, मतलब कोई ओकेजन टाइप वाले हो, जैसे बर्थडे है, छुट्टी है तो मूवी देख लेते हैं, या सबसे वर्स्ट टाइप  का क्राउड कॉलेज के दोस्तों का ग्रुप , तो ठीक है देख सकते हो, देखा जाए तो एक परफेक्ट 3 स्टार मूवी है।  मगर अगर आप रेगुलर पार्टी हो तो शायद हल्का अफ़सोस लगे क्योंकि स्क्रिप्ट बहुत स्ट्रांग था।

अच्छी स्क्रिप्ट थी।  स्टार लेके बनातें जैसे वेलकम टाइप तो, अच्छी कल्ट टाइप की हो सकती थी। पर फिर यह भी हो सकता था कि स्टार के साथ और खास कर इसमें तो मल्टीस्टार का स्कोप था (वेलकम टाइप), तो वो स्टार स्किप्ट एडजस्टमेंट का भी चक्कर हो सकता है, डायरेक्शन (बेसिकली स्टार कण्ट्रोल) फिर उसके बात बहुत सॉलिड चाहिए।

जैसे जब डायना पेंटी पहली बार पाकिस्तान पंहुचती है, तो वो घर वाला सीन बहुत अच्छा सीन है, अभय या लड़की भी उसको पूरा खींच नहीं पाएं। अब खींच नहीं पाए मतलब, एक स्टार सीन को एक अलग  लेवल पे जाता है, पर अभय स्टार नहीं है। जैसे देखिये पीयूष मिश्रा को, वो जमाया हैं , पर क्या पीयूष मिश्रा स्टार हैं ? क्यों नहीं।  नाना पाटेकर स्टार नहीं है ??  

P.S. हिंदी में लिखने की कोशिश कर रहा हूँ, क्योंकि मुझे लगता है कि औसत हिंदी में पढ़ने वाले लोगों की बौद्धिक क्षमता इंग्लिश में पढ़ने वालों से ज्यादा अच्छी होगी, क्योंकि अब ज्यादातर लोग अंग्रेजी मीडियम वाले हैं, तो उनके लिए अंग्रेजी अक्षरों को पढ़ना आसान है, क्योंकि अक्षर ज्यादा परिचित अंग्रेजी वाले हैं, मगर अगर आप थोड़ा आराम से हिंदी पढ़ ले रहें और आप पच्चीस के अंदर हैं तो इसका मतलब है कि आपको पढ़ने की आदत है, और यह तभी संभव है जब आपने कोर्स के बाहर पढ़ाई की है, फिर तो निश्चित रूप से आपकी बौद्धिक क्षमता अच्छी होगी, इस थीम पे अब आगे...      



Saturday, October 24, 2015

भरत Mahabharata Episode 20

वैशम्पायन जी कहते हैं...

समय आने पर शकुंतला के गर्भ से एक पुत्र हुआ। यह बालक बचपन से हीं बड़ा बलिष्ट था।  उसके ललाट चौड़े, कंधे सिंह जैसे, दांत नुकीले और उसके दोनों हाथो में चक्र था।  महर्षि कण्व ने विधि पूर्वक उसके जात कर्म आदि संस्कार किये।

मात्र छह वर्ष की आयु में हीं वह सारे जंगली जानवरों, हाथी-सिंह आदि को आश्रम के वृछो से बाँध देता।  कभी उनके दांत गिनता, कभी उन्हें प्रेम से सहलाता और कभी उनकी सवारी करता।  दिखने में तो वो बिलकुल देवकुमार लगता।  आश्रमवासियों ने उसके द्वारा सारे हिंसक जंगली जानवरों का दमन होते देख कर उसका नाम सर्वदमन रख दिया।

बालक के अलौकिक कर्म को देख महर्षि कण्व ने एक दिन शकुंतला को बुलाया और कहा

यह बालक अब युवराज बनने के योग्य हो गया है।  

फिर उन्होंने शिष्यों को बुलाकर कहा

तुमलोग शकुंतला और बच्चे को इनके घर पंहुचा आओ।  विवाहित स्त्री का बहुत दिनों तक मायके में रहना कीर्ति, चरित्र और धर्म का घातक है। 

शिष्यों ने आज्ञानुसार उन्हें हस्तिनापुर पंहुचाया और फिर वापस लौट गए।

सूचना और स्वीकृति के बाद शकुंतला राज्य सभा में पंहुची।

शकुंतला ने सभा में पंहुच कर प्रेम पूर्वक निवेदन किया... 

महाराज ! यह आपका पुत्र है, अब आप अपनी प्रतिज्ञा पूर्ण करते हुए इसे युवराज बनाइये।  

इस पर राजा दुष्यंत ने कहा

 अरी दुष्ट तापसी!! तू किसकी पत्नी है !! मुझे तो कुछ भी स्मरण नहीं है !! तेरे साथ मेरा धर्म अर्थ काम कोई सम्बन्ध नहीं है !! तू जा ठहर अथवा जो तेरी मौज में आये कर !!

ऐसा सुनकर शकुंतला बेहोश सी होकर खम्भे की तरह निस्चल खड़ी रह गयी।

उसकी आँखे लाल हो गयी, होठ फड़कने लगे, और दृष्टि टेढ़ी कर वो दुष्यंत की ओर देखने लगी।  थोड़ी देर ठहर कर दुःख और क्रोध से भरी शकुंतला ने कहा …

महाराज ! आप जान बूझकर ऐसी बाते क्यों कर रहे हैं ! ऐसा तो नीच पुरुष करते हैं ! आपका ह्रदय कुछ और कह रहा है और आप कुछ और कह रहे हैं। यह तो बहुत बड़ा पाप है।  आप ऐसा समझ रहे हैं कि उस समय मैं अकेला था और इसका कोई साक्षी नहीं है, ऐसा समझ कर आप यह बात कह रहे हैं  मगर आप यह न भूले कि परमात्मा सबके ह्रदय में बैठा है।  वो सबके पाप पुण्य को जानता है।  

पाप करके ये समझना कि मुझे कोई नहीं देख रहा है, घोर अज्ञान है। सूर्य, चन्द्रमा, वायु, अग्नि, अंतरिक्ष, पृथ्वी, जल, ह्रदय, यमराज, दिन, रात संध्या, धर्म - ये  सब मनुष्य के शुभ अशुभ कर्मो को जानते हैं।  जिस पर हृदयस्थित कर्मसाक्षी क्षेत्रज्ञ परमात्मा संतुष्ट रहते हैं, यमराज उनके पापों को स्वयं नष्ट कर देते हैं।  परन्तु जिसका अंतर्यामी संतुष्ट नहीं, यमराज स्वयं उसके पापों का दंड देते हैं।  

अपनी आत्मा का तिरस्कार कर जो कुछ का कुछ कर बैठता है, देवता भी उसकी सहायता नहीं करते, क्योंकि वह स्वयं भी अपनी सहायता नहीं करता।
  
मैं स्वयं आपके पास चली आयी हूँ, इसलिए आप साधारण पुरुषों की तरह भरी सभा में मेरे जैसी पतिव्रता स्त्री का तिरष्कार कर रहें हैं। अगर आप मेरी उचित याचना पे ध्यान नहीं देंगे, तो आपके सर के सौ टुकड़े हो जाएंगे !!

राजन ! मैंने तीन वर्ष तक इस बालक को अपने गर्भ में रखा था, इसके जन्म के समय आकाशवाणी हुई थी कि ये बालक सौ अश्वमेघ यज्ञ करेगा।  

दुष्यंत  ने कहा … 

शकुन्तले ! मुझे नहीं याद मैंने तुमसे कोई पुत्र उत्पन्न किया था। स्त्रियां तो प्रायः झूठ बोलती हैं। तुम्हारी बात पे कौन विश्वास करेगा।  तुम्हारी एक बात भी विश्वास करने योग्य  नहीं है। मेरे सामने इतनी बड़ी ढिठाई !! कहाँ विश्वामित्र, कहाँ मेनका, और कहाँ तेरे जैसी साधारण नारी !! चली जा यहाँ से !! इतने थोड़े दिनों में भला यह बालक साल के वृछ जैसा कैसे हो सकता है ! जा जा !! चली जा यहाँ से !! 

शकुंतला ने कहा

राजन !! कपट न करो !  चाहे सारे वेदों को पढ़ लो, सारे तीर्थो में स्नान कर लो मगर फिर भी सत्य उससे बढ़कर है। सत्य स्वयं परमब्रह्म परमात्मा है।  सत्य हीं सर्वश्रेष्ठ प्रतिज्ञा है।  तुम अपनी प्रतिज्ञा मत तोड़ो ! तुम इसे स्वीकार करो अथवा नहीं, यह बालक हीं सारे पृथ्वी पर राज्य करेगा।  

इतना कह कर शकुंतला सभा से निकल पड़ी।  तभी वहां आकाशवाणी हुई। 

शकुंतला की बात सत्य है।  तुम शकुंतला का अपमान मत करो।  औरस पुत्र तो पिता को यमराज से भी चुरा लाता है।  तुम अपने पुत्र का भरण पोषण करो। तुम्हे हमारी आज्ञा मान कर ऐसा हीं करना चाहिए। तुम्हारे भरण- पोषण के कारण इसका नाम भरत होगा।  

आकाशवाणी सुनकर दुष्यंत आनंद से भर गए।  उन्होंने मंत्रियों और पुरोहितों को कहा... 

आपलोग कानो से देवताओं की वाणी सुन ले।  मैं ठीक-ठीक जानता और समझता हूँ कि यह मेरा हीं पुत्र है, मगर अगर मैं इसे सिर्फ शकुंतला की बाते सुनकर अपना लेता, तो सारी प्रजा इस पर संदेह करती और इसका कलंक नहीं छूट पाटा।  इसी उद्देस्य से मैंने शकुंतला का इतना अपमान किया।  

अब उन्होंने बच्चे को स्वीकार कर लिया। उसके सारे संस्कार करवाये।  उन्होंने पुत्र का सर चूमकर उसे हृदय से लगा लिया।

 दुष्यंत ने  धर्म के अनुसार अपनी पत्नी का स्वागत किया और कहा... 

देवी !! मैंने तुम्हारे मान को रखने के लिए हीं तुम्हारा इतना अपमान किया।  सबलोग तुम्हे रानी के रूप में स्वीकार कर ले इसीलिए मैंने तुम्हारे साथ क्रूरता के साथ व्यवहार किया।  अगर मैं सिर्फ तुम्हारी बात  अपना लेता तो लोग समझते कि मैंने मोहित होकर तुम्हारी बात पे भरोषा कर लिया। लोग मेरे पुत्र के युवराज होने पे भी आपत्ति करते।  मैंने तुम्हे अत्यंत क्रोधित कर दिया था, इसलिए प्रणयकोपवश तुमने मुझसे जो अप्रिय वाणी कही उसका मुझे कुछ भी विचार नहीं है।  हम दोनों एक दुसरे के प्रिय हैं।  

ऐसा कह कर दुष्यंत ने अपनी प्राण-प्रिया को भोजन वस्त्र आदि से संतुष्ट कर दिया।

समय आने पर भरत का युवराज पद पर अभिषेक हुआ।  दूर दूर तक भरत का शासन चक्र प्रसिद्द हो गया।  वह सारे पृथ्वी का चक्रवर्ती सम्राट हुआ।

उन्होंने इंद्र के सामान बहुत सारे यज्ञ किये।

महर्षि कण्व ने उनसे गोवितत नमक अश्वमेघ यज्ञ कराया। उसमे यों तो बहुत सारे ब्राह्मणो को दक्षिणा दी गयी, मगर महृषि कण्व को सहस्त्र पद्म मुहरे दी गयी थी।  

भरत से हीं इस देश का नाम भारत पड़ा और वो भरतवंश का प्रवर्तक माना गया।   

           


  


Friday, October 23, 2015

दुष्यंत और शकुंतला की कहानी... Mahabharata Episode 19

जनमेजय ने कहा...

भगवन मैंने अब आपसे देवता-दानव के अंश से अवतरित होने की कथा सुन ली है । अब आपकी पूर्व सूचना के अनुसार कुरुवंश का वर्णन सुनना चाहता हूँ … 

वैशम्पायन जी कहते हैं ...

महाराज कुरुवंश* का प्रवर्तक था परम प्रतापशाली राजा दुष्यंत। समुद्र से घिरे और मल्लेछों के देश भी उसके अधीन थे। सभी लोग राज्याश्रय में निर्भय रहकर निष्काम धर्म का पालन करते थे।

दुष्यंत स्वयं विष्णु के सामान बलवान, सूर्य के सामान तेजस्वी, समुन्द्र के सामान अक्षोब्य और पृथ्वी के सामान क्षमाशील था। लोग प्रेम से उसका सम्मान करते और वह धर्म बुद्धि से सबका शाषण करता।

एक दिन वो अपनी पूरी सेना को लेकर एक गहन वन से गुजर रहे थे। उस गहन वन के पार हो जाने पर उन्हें एक आश्रम दिखा। वो आश्रम एक ऐसे उपवन में बना था जिसकी छटा देखतें हीं बनती थी। 

अग्निहोत्र की ज्वालायें प्रज्वालित हो रही थी, वालखिल्य आदि ऋषियों, जलाशयों, पुष्प, पक्षियों के मधुर ध्वनि के कारण उस जगह की शोभा अद्भुत हो रही थी। ब्राह्मण देवताओं की स्तुति कर रहे थे, सामने मालिनी नदी बह रही थी, राजा दुष्यंत को लगा मानो वो ब्रह्मलोक में हीं आ गए हो। 

यह सब देखते देखते राजा दुष्यंत वहां कश्यप गोत्रधारी मह्रिषी कण्व के आश्रम में आ पंहुचे।  उन्होंने मंत्रियों को द्वार के बहार हीं रोक दिया और अकेले हीं अंदर आयें।  आश्रम को सुना देख उन्होंने आवाज लगायी…  

" यहाँ कोई है !!! "

तभी अंदर से एक लक्ष्मी के सामान सुन्दर कन्या बाहर आयी और उसने आसान, पाद्य और अर्घ्य के द्वारा राजा का आतिथ्य करके उनका कुशल समाचार पुछा।  स्वागत -सत्कार के बाद कन्या ने तनिक मुस्करा कर उनसे कहा … 

"मैं आपकी और क्या सेवा करूँ ?"

राजा दुष्यंत ने कहा ...

मैं महर्षि कण्व के दर्शन करने  के लिए आया हूँ , वो अभी कहाँ हैं???   

उस सर्वांगसुंदरी, रूपवती कन्या ने कहा ... 

" महर्षि कण्व जंगल से फल फूल लाने गए हैं.। आप घडी दो घडी उनकी प्रतीक्षा करे, वो आते हीं होंगे, तब आप उनसे मिल सकेंगे …  "

ऋषि कन्या के रूप को देख राजा दुष्यंत उसपे मोहित हो गए और उन्होंने उससे पुछा …

हे सुंदरी ! तुम कौन हो, तुम्हारे पिता कौन है, और किसलिए तुम यहाँ आयी हो, तुमने मेरा मन मोहित कर लिया है… मैं तुम्हे जानना चाहता हूँ।  

ऋषिकन्या ने कहा ...

मैं महर्षि कण्व की पुत्री हूँ…

इस पर दुष्यंत ने कहा 

मगर महर्षि कण्व तो ब्रह्मचारी हैं, सूर्य अपने पथ से विचलित हो सकता है मगर महर्षि कण्व नहीं, फिर ऐसा कैसे हो सकता है कि तुम उनकी पुत्री हो।  

कन्या ने कहा...   

राजन ! एक ऋषि के पूछने पर मह्रिषी कण्व ने मेरे जन्म की कहानी सुनाई थी।  उससे मैं जान सकी हूँ कि जब परम प्रतापी विश्वामित्र अपनी घोर तपस्या में लीन थे, तो देवराज इंद्र ने मेनका को उनकी तपस्या भंग करने के लिए भेजा था, उन्ही दोनों के संसर्ग से मेरा जन्म हुआ था, माता मुझे वन में छोड़ कर चली गयी थी, तब शकुंतो (पक्षियों) ने मेरी रक्षा की थी इसलिए मेरा नाम शकुंतला पड़ा ।। बाद में मह्रिषी कण्व मुझे अपने आश्रम में ले आएं।  शरीर के जनक, रक्षक और अन्नदाता तीनो हीं पिता कहे जाते हैं, इस तरह महर्षि कण्व मेरे पिता हुए … 

इस पर राजा दुष्यंत ने कहा.…  

विश्वामित्र तो क्षत्रिय थे, अतः तुम क्षत्रिय हुई। इसलिए तुम मेरी पत्नी बन जाओ ! क्षत्रियों के लिए गन्धर्व विवाह सर्वश्रेष्ठ माना गया है , अतः तुम मुझे खुद हीं वरण कर लो।  

इस पर शकुंतला ने कहा.…  

मेरे पिता अभी यहाँ नहीं हैं, उन्हें यहाँ आने दीजिये, वो खुद हीं मुझे आपकी सेवा में समर्पित कर देंगे !!   

इस पर राजा दुष्यंत ने कहा...  

मैं चाहता हूँ तुम खुद हीं मेरा वरण कर लो, मनुष्य स्वयं हीं अपने सबसे बड़ा हितैषी है, तुम धर्म के अनुसार स्वयं हीं मुझे अपना दान कर दो…

यह सुनकर शकुंतला ने कहा.… 

अगर आप इसे धर्मानुकूल मानते हैं और मुझे स्वयं का दान करने का अधिकार हैं तो मेरी एक शर्त सुन लीजिये, कि मेरे बाद मेरा हीं पुत्र सम्राट बनेगा और मेरे जीवनकाल में हीं वो युवराज बन जाये !!! 

राजा दुष्यंत ने बिना कुछ सोचे समझे वैसी हीं प्रतिज्ञा कर ली और गन्धर्व विधि से उसका पाणिग्रहण कर लिया।  

दुष्यंत ने उसके बाद उससे समागम कर बार बार उसे यह विश्वास दिलाया कि.… 

" मैं तुम्हे लाने के लिए चतुरांगणी सेना भेजूंगा और शीघ्र से शीघ्र तुम्हे अपने महल में बुला लूँगा …

ऐसा बोल कर वो बिना महर्षि कण्व से मिले बिना सेना सहित वापस नगर लौट गए।  

रास्ते भर वो ये सोंचते रहें कि पता नहीं महर्षि कण्व यह सब जान कर न जाने क्या करेंगे … 

थोड़ी हीं देर में महर्षि कण्व आश्रम में आ पहुंचे।  लाज के मारे शकुंतला उनसे छिप गयी।  

महर्षि कण्व ने अपनी दिव्य दृष्टि से यह जान लिया कि क्या हुआ था, उन्होंने शकुंतला को बुला कर कहा 

तुमने मुझसे छिप कर, एकांत में जो कार्य किया है वह धर्म के विरुद्ध नहीं है।  क्षत्रियों के लिए गन्धर्व विवाह शास्त्रोचित है, दुष्यंत एक उदार, परम प्रतापी और धर्मात्मा पुरुष है, उसके संयोग से एक बड़ा बलवान पुत्र पैदा होगा और वो सारी पृथ्वी का राजा होगा…   

       

   

  

    



    

Sunday, July 19, 2015

लाइन आ गया

कल वही हुआ जो अक्सर हमलोगों के साथ होते आया है। मोहल्ले के सारे घरों में बिजली थी, सिवाय हमारे घर के। और जो भी इस बात का मर्म जानतें हैं, उन्हें पता होगा यह कितना बैचैन कर देने वाला समय होता है!!!

और उस वक़्त आप किसी भी कीमत में अपने घर में बिजली चाहतें हैं!! हालांकी इस बार बिजली हमारे पुरे फेज की नहीं थी मगर फिर भी ऐसा फेज हमेशा हमारा वाला फेज हीं क्यों होता है यार!!

और ऐसे मौके पे मेरे अन्दर एक सवाल आया... 

"अरे हमलोगों के यहाँ दोनों फेज का लाइन नहीं है क्या !!! "

क्योंकी अक्सर हीं, कम से कम हमलोग इस तरह के शुद्ध सरकारी privileges से मरहूम तो नहीं हीं रहते थे कभी भी!!

तब इस फेज और बिजली के चक्कर में हमलोग बिजली ऑफिस गएँ।

इस छोटी सी यात्रा ने मुझे, बिजली के साथ विकास के नाते की जो एक अकादमिक बहस है, उसको थोडा अपने lived एक्सपीरियंस से जोड़ कर देखे जाने की एक अद्भुत प्रेरणा दी है।

बिजली का ज़िन्दगी में क्या महत्व है, इस बात को मैं थोड़ी ज्यादा गंभीरता से समझने का दावा रख सकता हूँ।

मैंने अपनी ज़िन्दगी में ठीक-ठाक समय, उम्र के करीब हर पड़ाव में, चाहे बचपन हो, किशोरावस्था हो या जवानी, ठीक-ठाक समय हर तरह के जगहों में बिताया है चाहे जहाँ … 

1. चौबिसों घंटे बिजली है!!!

2. अथवा जहाँ बिजली हैं हीं नहीं!!! मतलब पोल वोल भी नहीं है, और दूर-दूर तक पोल नहीं हैं!!! मतलब लालटेन, पेट्रोमेक्स, डीबरी वगैरह ज़िन्दगी का एक हिस्सा है। और एक ज़माने में यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ़ बिहार में ऐसे बड़े-बड़े क्षेत्र थे जहाँ या तो बिजली के पोल हीं नहीं थे अथवा थे भी तो उनमे उद्घाटन के बाद फिर जो ट्रांसफार्मर उड़ा तो कभी लाइन आयी हीं नहीं दुबारा। लालू ने ऐसे हीं लालटेन छाप से हंगामा नहीं मचा दिया था बिहार में !! 

3. जहाँ ठीक-ठाक बिजली रहती है, टाइम पे लोड शेडिंग होती है, जैसे 6-7 शाम या 8-10 सुबह।।

4.  या ऐसी जगह जहाँ बिजली ठीक-ठाक है, कोई नियम नहीं हैं, जा भी सकती है पर अक्सर रहती है पर कोई गारेन्टी नहीं है ,

5. या जहाँ 24 घंटे में 2-6 घंटे बिजली है, वैसा जैसे लगता है गुजरात था मोदी जी के पहले। क्योंकि उनको मैंने अक्सर ये कहते सुना कि कैसे उनके मुख्यमंत्रित्व काल के प्रारंभ में लोग कहा करते थे...

"मोदी जी कुछ करो या न करो , मगर रात में जब खाना खाने बैठे , तब तो तो बिजली हो, इतना तो कर दो"।।। 

तो वैसी जगह जहाँ बिजली ज्यादातर नदारद हीं रहती है।।।

इन सभी जगहों की एक अपनी दुनिया है।

पता नहीं कितने लोगों को ये थ्रिलिंग लगेगा कि जब मैच होना हो तो भारत जीते, या टीम में कौन खेल रहा है या किसको खेलना चाहिए से परे भी एक चिंता है और वो है… 

यार!! मैच के समय कहीं लाइन ना काट जाए....!!


एक दर्दनाक अनुभव जो याद है, वो है हीरो कप का सेमी फाइनल। तेंदुलकर का वो ओवर!! गया में थे हमलोग उस वक़्त। ए पी कॉलोनी मे।   

एक अलग मुसीबत थी। लाइन थी, मगर हमलोगों के घर या फेज में वोल्टेज हीं इतना ज्यादा था कि आप कोई इलेक्ट्रिक एप्लायंसेज यहाँ तक की बल्ब भी नहीं जला सकते थे!!

आखिरी ओवर, वो क्लाइमेक्स वाला, आते-आते आखिरकार स्टेबलाइजर ने जवाब दे दिया, और फाइनली टीवी बंद हो गया।  

दिन होता तो कहीं दूसरों के घर भाग जाते पर घर में जेल कि तरह सूर्योदय से सूर्यास्त वाला नीयम था, और रात के दस-वस  बज रहे होंगे!!  

रेडियो का खोजइया शुरू हुआ !! और अगर खराब निकला तो अलग डांट !!

देखिये और जगहों में मतलब नॉन ऑफिसर कॉलोनी वाले मकानो में लाइन है, उनका वोल्टेज ठीक है, हमलोग अँधेरे में, मोमबत्ती की रोशनी को आप अँधेरा हीं कहेंगे, में रेडियो पे हैं और वो भी एक जमाने के बाद खुला है और जल्दी-जल्दी में स्टेशन पकड़वा लेना भी मज़ाक नहीं हैं।

अब यहाँ जिनके पास टीवी है, वो लाइव देख रहें हैं, बीट होता और वो झट से देख लेते की बीट हो गया, और हल्ला शुरू होता और हम तो कमेंटेटर के कमेंट के मोहताज है!! 

अगल बगल हल्ला हो जाता, जैसे हीं बीट होता, टीवी पे लाइव दिखायी जा रही थी, हमें कमेन्ट्री और आस -पास के हल्लो में से दोनों जगहों से इनफार्मेशन मिल रही थी। 

तेंदुलकर ने 6 शानदार बाल डाले।  आपको याद हो तो मैकमिलन खड़ा रह गया दुसरे छोड़ पे और भारत जीत गया। खुशी की बात थी मगर हमारा हार्ट फेल नहीं हुआ, ये काम आश्चर्य भी नहीं है।

या जब एक बार घाटशिला में जब ट्रांसफार्मर उड़ गया था, तो करीब दो महीने तक एक शहर में हम बिना लाइन के थे। शाम को जब हमलोग क्रिकेट खेल के वापस घर आतें तो थे तो हमे पता था कि लाइन नहीं आएगी। 

मतलब अब ऐसा नहीं था कि आप शाम में घर लौट के आएं और लाइन कटा हुआ है बोलके आपको और थोड़ी देर बाहर आस पास में हीं कॉलोनी में थोड़ा और आवारागर्दी करने का मौका मिल गया हो। 

ऐसा नहीं होगा क्योंकि बिजली तो आनी हीं नहीं है, इस कारण जल्दी लौटना बल्कि अब एक जरूरत थी। घर आओ!! लालटेन वालटेन का हाल देखो !! जी सर लालटेन!!  

लालु यादव का चुनाव चिन्ह गरीबी की नहीं, प्रतिष्ठा का सिंबल था वो। अपना अलग लालटेन होना टेबल लैंप होने से ज्यादा बड़ी बात थी।   

शुरू में बहुत हल्ला हुआ। तरह तरह के अफवाह उड़े !! 

कल बन जाएगा, आज टाटा से देख के गया है, HCL वाला लोग दे रहा है से लेकर के TV टावर वाला दे रहा है, ये-वो सब कुछ !! बस PIL का वैसा ज़माना नहीं था, मेरे ख़याल से 94 ईश्वी की बात  है, नहीं तो हाई कोर्ट दे रहा है वाला हल्ला भी हो जाता!! 

खैर कुछ नहीं हुआ और 20-25 दिनों के बाद सभी लोग हार गएँ। यहाँ तक की अफवाह फैलाने वाले भी हार कर चुप हो गएँ, जो बिजली ना होने के कारण जो अक्सर हीं एक उदासी छाई रहती थी वो उदासी भी लोग भूल गए!!

मतलब लोग भूल गएँ की बिजली भी कोई चीज़ होती है. सचमुच इंसानो के एडजस्ट और एडाप्ट करने के क्षमता बड़ी आश्चयर्जनक और अविश्वासनीय है!!

इन्वर्टर का तो सवाल हीं बेकार है, घर में थी भी नहीं और जिनकी थी भी, बिजली तो पिछले एक महीने से नहीं थी, वो कब के बैठ चुके थे …

और घाटशिला शहर, पता नहीं अभी कैसा है, उस वक़्त तीन हिस्सों में बटा था। 

एक था माइनिंग कॉपर कंपनी वाला इलाका, जहाँ २४ घंटे बिजली-पानी थी, दूसरा बाजार इलाका और तीसरा फुलडूँगरी; जहाँ पे कोर्ट और ब्लॉक ऑफिस थी, सरकारी ऑफिस वाला इलाका मतलब, जहाँ अफसर कॉलोनी थी, जहाँ हमलोग रहते थे, और ट्रांसफार्मर सिर्फ फुलडूँगरी इलाके का, जहाँ हमारा घर था, का उडा था. वैसे तो फुलडूँगरी बड़ा इलाका था, मगर बाजार वाला इलाका नहीं था.

अब देखिये चूंकि ज्यादातर इलाका जो इस उड़े हुए ट्रांसफार्मर की सीमा क्षेत्र में आता था, वो ऑफिस वाले थे, जहाँ दिन में लाइट की जरूरत थी नहीं, उस वक़्त टाइप राइटर का ज़माना था, प्रिंट आउट का नहीं !! पता नहीं ज़ेरॉक्स-वेरोक्स कैसे होता था, या पता नहीं लोग कार्बोन कॉपी या अठारहवीं सदी में पूरी तरह से लौट कर "नक़ल" पे उतर आएं थे, याद नहीं अब!! बात असली वो नहीं है यहां। 

बाजार का उड़ता तो दूकान वाले लोग या जनरल मोहल्ले वाले भी खटा-खट चंदा इकठ्ठा करके सामूहिक रिश्वतखोरी के लिए पैसा जुगाड़ कर लेते!! मगर यहाँ तो ज्यादातर सरकारी ऑफिस वाले थे, अब वहां पे जो कुछ एक लोकल पब्लिक थी भी वो अब कैसे मतलब इन सरकारी अधिकारियों से चंदा मांगे !!

मुसीबत बड़ी थी।  

क्रमशः !!! 

Saturday, July 18, 2015

मतलब से मतलब

क्या हमारी कोई भाषा है। 
क्या ये भाषा यहाँ पर मेरी होनी चाहिए थी।
क्या हमरी लिखने से उसका मतलब मेरी हो जाता।
क्या आँखों की भाषा होती है 
और अगर होती है
तो क्या उसका भी व्याकरण होता है।
उसका पाणिनि कौन है ?

क्या बकवास है और क्या नहीं
इसका अंतर क्या मतलब से निकलता है।
क्या मतलब के दो मतलब नहीं होते ।
जब हम किसी बात का मतलब निकालते हैं
तो उस वक़्त मतलब का क्या मतलब होता है।
क्या यह एक कविता है जो हम गुनगुना नहीं सकते।

‎चूहा

तुम्हारे जो पर थे वो कल कुतर दिए हैं मैंने 
फुदकने के अलावा तुम्हारे पास अब रखा क्या है। 

आसमान में तो उड़ सकते नहीं हो तुम अब 
और जमीन पे चलना तो सीखा नहीं है तुमने ।।

"य पश्यति सः पश्यति"

"य पश्यति सः पश्यति"
जो ये देखता है वह देखता है ।

देखने का मतलब क्या होता है ।
तुम कुर्सी देखते हो 
या तख्ते-ताउस देखते हो।

तुम राम देखते हो
या राजा राम देखते हो ।
तुम राम का नाम देखते हो
या उसका काम भी देखते हो ।

टीवी में भी हम देखते हैं
और टीवी को भी देखते हैं।
अगर तुम आँखों से देखते हो तो हम पैरो से चलते हैं। 

फिर कहीं पहुँचने का क्या मतलब हुआ
गाडी खरीदने का फिर क्या मतलब हुआ ।