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Friday, January 16, 2015

जो इसमें नहीं है वो और कहीं नहीं है.… Mahabharata Episode 15

शौनक जी ने तब कहा........

सुतनन्दन! आपने कहा था कि इस सर्प-सत्र के अंत में जनमेजय कि प्रार्थना पे, भगवान श्री कृष्णद्वैपावन ने अपने शिष्य वैशम्पायन जी को यह आज्ञा दी थी कि, तुम इस महाभारत की कथा इन्हे सुनाओ।  अब मैं भगवन व्यास जी के मनः सागर से उत्पन्न उस महाभारत के कथा को सुनना चाहता हूँ. आप मझे वो कथा सुनाइए।   

उग्रश्रवा जी ने कहा……

अब मैं वही कथा तुम्हे आरम्भ से सुनाता हूँ।  मुझे भी यह कहानी सुनाने में बड़ा हर्ष होता है।।


जब भगवान श्री कृष्णद्वैपावन को यह बात मालुम पडी कि, जनमेजय सर्प यज्ञ के लिए दीक्षित हो चुके हैं, तो वो अपने शिष्यों के साथ वहां आये।

भगवान व्यास का जन्म शक्ति पुत्र पराशर के द्वारा सत्यवती के गर्भ से यमुना की रेती में हुआ था। * 

वो पांडवो के पितामह थे।  वो जन्मते हीं स्वेच्छा से बड़े हो गए और साङ्गोपाङ्ग वेदो और इतिहासों का ज्ञान प्राप्त कर लिया।

उन्हें जो ज्ञान प्राप्त हुआ था उसे कोई तपस्या, वेदाध्यन, व्रत, उपवास, स्वाभाविक शक्ति और विचार से प्राप्त नहीं कर सकता था।

उन्होंने एक हीं वेद  को चार भागो में विभक्त कर दिया। *

उन्ही की कृपा प्रसाद से धृतराष्ट्र, पाण्डु और विदुर का जन्म हुआ था।

अपने शिष्यों के साथ उन्होंने यज्ञमंडप में प्रवेश किया। उन्हें देखते हीं राजा जमेजय सहित सारे सभासद, ऋत्विज झटपट अपनी-अपनी जगहों से खड़े हो गए।    

राजा जनमेजय ने आगे बढ़कर उनका यथोचित स्वागत-सत्कार किया और कहा

भगवन ! आपने तो पांडवो और कौरवो को अपनी आँखों से देखा है।  वो तो बड़े धर्मात्मा थे, फिर उनलोगों में अनबन क्यों हुआ !! इतना घोर युद्ध होने की नौबत कैसे आ गयी ?? इससे तो सारे प्राणियों का बड़ा अनर्थ हुआ होगा, अवश्य हीं दैववश उनका झुकाव युद्ध की तरफ हो गया होगा ?? आप कृपया करके मुझे उनकी पूरी कथा सुनाइए।  

जनमेजय की यह बात सुनकर वेद व्यास ने वहां बैठे अपने शिष्य वैशम्पायन जी को कहा

तुम मुझसे पूरी महाभारत की कथा सुन चुके हो, अब वही बात तुम जनमेजय को दुहरा दो…… 

इस पर वैशम्पायन जी ने संकलप के द्वारा गुरु को प्रणाम किया और कहा

यह कथा एक लाख श्लोको में कही गयी है।  इसके वक्ता और श्रोता दोनों ब्रह्मलोक में जाकर देवताओं के सामान हो जाते हैं। यह उत्तम और पवित्र पुराण वेद तुल्य है।  सुनने और सुनाने योग्य कथाओं में उत्तम है।

इससे मनुष्य को अर्थ और काम की प्राप्ति के धर्मानुकूल उपाय बताये गए, और मोक्ष तत्त्व को पहचानने की बुद्धि भी आ जाती है।

इस इतिहास का नाम जय है, और चूँकि इसमें भरतवंशी के जन्मो का महान कीर्तन है, इसलिए इसे महाभारत भी कहते हैं।

भगवान श्री कृष्णद्वैपावन जी हर दिन सुबह उठकर स्नान संध्या आदि से निवृत होकर इसका निर्माण करते थे। इस कार्य में उन्हें तीन वर्ष का समय लगा, इस लिए इसका श्रवण भी उसी प्रकार नियम से करना चाहिए।

जैसे समुद्र और सुमेरु पर्वत रत्नो की खान है वैसे हीं ये ग्रन्थ भी कथाओ का मूल उद्गम है।  धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष  सम्बन्ध में जो बात इस है, वही सवत्र है।

जो इसमें नहीं है वो और कहीं  नहीं है.…… 





 


     

"ठहर जा !! ठहर जा !! ठहर जा !!" Episode 14

उग्रश्रवा जी कहते हैं…

इस प्रकार यज्ञ में बहुत से सर्प नष्ट हो गए और थोड़े हीं बचे। इससे वासुकि नाग को बड़ा कष्ट हुआ। उन्होंने घबराये हुए स्वरों में अपनी बहन, ऋषिपत्नी जरत्कारु को कहा.…

बहिन !! मेरा अंग-अंग जल रहा है। आँखों के आगे इतना अँधेरा छाया है कि मेरा दिशा ज्ञान खोता चला जा रहा है। खड़ा होना भी मुश्किल है!! लगता है मैं भी बलात पूर्वक उस यज्ञ की अग्नि में जा गिर पडूंगा।  

मैंने इसी समय के लिए तुम्हारा विवाह जरत्कारु ऋषि से कराया था। तुम अपने पुत्र आस्तिक को ब्रह्मा जी के कथनानुसार इस यज्ञ को बंद कराने के लिए कहो।  

इस पर ऋषिपत्नी जरत्कारु ने अपने पुत्र को सारा इतिहास बतला कर, उन्हें सर्पो की रक्षा के लिए प्रेरित किया। इस पर आस्तिक बोले

"नागराज!! आप मन में शांति रखिये। मैं आप से सत्य-सत्य कहता हूँ, मैं उस श्राप से आपलोगों को मुक्त करा लूंगा. मैंने कभी परिहास में भी असत्य वचन नहीं बोला है।

मैं अपने मीठे वचनो से राजा जनमेजय को प्रसन्न कर लूँगा और वह यज्ञ बंद कर देगा। मामा जी !! आप मेरा विश्वास करें  …"   

यह बोलकर, आस्तिक यज्ञशाला की तरफ चल दिए।

वहां पंहुच कर उन्होंने देखा की सूर्य और अग्नि के सामान तेजस्वी सभासदों से पूरी यज्ञशाला भरी पड़ी है। द्धारपालो ने उन्हें यज्ञ मंडप में प्रवेश करने से रोक दिया।

इस पर आस्तिक द्धार से खड़े-खड़े हीं यज्ञ की स्तुति करने लगे।

उनके द्वारा यज्ञ की स्तुति सुनने के पश्चात, जनमेजय ने उन्हें अंदर आने दे दिया।

अंदर आ कर वो और ऋत्विजों के साथ यज्ञ की स्तुति करने लगे। अभी वो बालक हीं थे मगर उनकी स्तुति सुनकर राजा, सभासद, ऋत्विज और अग्नि सभी प्रसन्न हो गए।  जनमेजय ने खुश हो कर कहा.…

"यद्यपि ये बालक हैं, पर फिर भी बात अनुभवी वृद्धों के समान कर रहा है। मैं इसे वर देना चाहता हूँ। आपकी क्या मंत्रणा है!!! "

इस पर वहां मौजूद सभी सभासदों, ऋत्विजों ने एक स्वर में कहा

बालक ब्राह्मण भी राजा के लिए सम्मानीय है ,फिर, अगर वो बालक विद्वान हो तो कहना हीं क्या!!! अतः आप इस बालक को मनमांगी वास्तु दे सकते हैं।।

इस पर राजा जनमेजय ने कहा

आपलोग और प्रयत्न्न कीजिये जिससे तक्षक नाग यहाँ आ कर भष्म हो। वही तो मेरा प्रधान शत्रु है। ।

ऋत्विजों ने कहा

अग्निदेव का कहना है कि तक्षक इंद्र की शरण में चला गया है और उन्होंने उसे अभयदान दिया है… 

इस पर जनमेजय ने कुछ खिन्न होकर कहा …

आपलोग कुछ ऐसा कीजिये कि वो इंद्र के सहित इस अग्नि में आ गिरे… 

इसके बाद होता ने आहूति डाली, तो उसी समय तक्षक और इंद्र दोनों आकाश में दिखाई दिए। इंद्र तो उस यज्ञ को देखकर बहुत हीं घबरा गए और तक्षक को छोड़ कर चलते बने।

तक्षक क्षण-क्षण अग्नी ज्वाला के समीप आने लगा, तब ब्राह्मणो ने कहा.…

अब आपका काम ठीक -ठीक हो रहा है।  आप इस ब्राह्मण को वर दे दीजिये....  

तब राजा जनमेजय ने कहा

ब्राह्मणकुमार ! मैं आपके जैसे सत्पात्र को वर देना चाहता हूँ।  अतः आपकी जो इच्छा हो ,वो आप मांग ले। आपको मैं कठिन से कठिन वर भी दूंगा। आप मांगिये।  

आस्तिक ने देखा कि अब तक्षक अग्नि में गिरने हीं वाला है तो उसी वक़्त उन्होंने वर माँगा

राजन !! आप प्रसन्न हों तो इसी समय यह सर्प यज्ञ बंद कर दे, जिससे इसमें गिरते हुए सर्प  बच जाए। । 

इस पर जनमेजय ने कुछ अप्रसन्न होकर कहा.…

समर्थ ब्राह्मण!! तुम सोना- चांदी, धन, गाये, राज्य कुछ भी मांग लो मगर यह नहीं। 

इस पर आस्तिक ने कहा

मुझे और कुछ नहीं चाहिए।  मातृकुल के कल्याण के लिए मैं आपका यज्ञ हीं बंद कराना चाहता हूँ।  

जनमेजय के बार-बार मनाने के बावजूद जब आस्तिक ने दूसरा वर नहीं माँगा, तो सभी सभासदों ने एक स्वर से कहा

ये ब्राह्मणकुमार जो भी मांगता है, इसे मिलना हीं चाहिए।। 

तब शौनक जी ने पुछा

सुतनन्दन!! उस यज्ञ में तो और भी ब्राह्मण और विद्वान ऋत्विज मौजूद थे, तो आस्तिक के बात करते -करते तक्षक अग्नि में नहीं गिरा, इसका क्या कारण हुआ ?? क्या ब्राह्मणो को वैसे मंत्र नहीं सूझे ??? 

इस पर उग्रश्रवा जी कहतें हैं

जब तक्षक इंद्र के हाथों से छूटा तो वो मुर्क्षित हो गया। तब आस्तिक ने तीन बार कहा

"ठहर जा !! ठहर जा !! ठहर जा !!"

इससे वो यज्ञ-कुंड और आकाश के बीच स्थिर हो गया और अग्नि में नहीं गिरा …

सभासदों के बार-बार कहने पर आख़िरकार, राजा जनमेजय ने कहा.…

अच्छा!! आस्तिक की इच्छा पूर्ण हो।  यज्ञ बंद हो और इसी के साथ हमारे सूत की बात भी सच साबित हुई।

इसके बाद जनमेजय ने वहां आये सारे ऋत्विज, सदस्यों और ब्राह्मणो को भरपूर दान दिया. और उस सूत का भी बहुत सत्कार हुआ।।

आस्तिक का भी बहुत आदर-सत्कार हुआ। जनमेजय ने उन्हें विदा करते समय कहा.…

आप मेरे अश्वमेघ यज्ञ में सभासद बने........ 

आस्तिक ने कहा ……  

तथास्तु !!  

इसके बाद आस्तिक ने अपने मामा के घर जाकर उन्हें सारी बात बतायी।

उस समय नागराज वासुकि की सभा में सारे बचे हुए सर्प उपस्थित थे। आस्तिक की बात सुनकर सारे सर्प बड़े प्रसन्न हुए।  वासुकि जी ने बड़े प्यार से उन्हें गले लगा कर कहां……

बेटा !! तुमने हमे मृत्यु के मुँह से निकाल दिया।  बताओ हम ऐसा क्या करें जिससे तुम प्रसन्न हो..... वर मांगो !!! 

इस पर आस्तिक ने कहा

"आप सभी सर्प मुझे वर दे कि जो भी मनुष्य धर्मपूर्वक इस कथा का प्रातःकाल और संध्याकाल में पाठ करे, उसे सर्पों से कोई भय नहीं हो…"

इस पर सर्पों ने एक सुर से कहा

ऐसा हीं होगा !!!!!!!!!!!!


















  








      

सर्प-यज्ञ का प्रारम्भ Episode 13

उग्रश्रवा जी कहते हैं.…

अपने मंत्रियों से अपने पिता की मृत्यु का इतिहास जानने के बाद राजा जनमेजय के अंदर क्रोध और दुःख दोनों के भाव उभरे।

उनके आँखों से आंसू गिरने लगे।  दुःख, शोक, और क्रोध से अभिभुर, आँखों से आंसू बहाते हुए, उन्होंने हाथों में जल लेकर, शाष्त्रोयुक्त तरीके से यह प्रतिज्ञा की.….

"मैं तक्षक से अपने पिता की मृत्यु का बदला लेने का संकलप करता हूँ!! उस दुष्ट तक्षक के कारण हीं मेरे पिता की मृत्यु हुई है.श्रृंगी ऋषि का श्राप तो सिर्फ एक बहाना मात्र था. इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण यह है कि उसने कश्यप ऋषि को ,जो मेरे पिता का विष उतारने के लिए आ रहे थे, उनको धन दे कर लौटा दिया. 

अगर उसने ऐसा नहीं किया होता,तो अवश्य हीं मेरे पिता को कश्यप ऋषि जीवित कर देते, और इससे श्रृंगी ऋषि का श्राप भी पूरा हो जाता और मेरे पिता भी जीवित रहते। इससे भला उस तक्षक की क्या हानि हो जाती ....." 

मंत्रियों ने राजा जनमेजय की प्रतिज्ञा का अनुमोदन किया।।

जनमेजय ने तब अपने मंत्रीगणों और पुरोहितो से ये पुछा कि बताइये……

तक्षक ने मेरे पिता के साथ हिंसा की है, मैं इसके लिए उसे उस सर्प को धधकती आग में होम करना  चाहता हूँ ।।आप कोई ऐसी ऐसी विधि बताइये …....  

इस पर ऋत्विजों ने कहा
राजन !! पहले से हीं देवताओं ने आपके लिए एक महायज्ञ का निर्माण कर रखा है. यह बात पुराणो में भी वर्णित है। आपके अलावा ये महायज्ञ और कोई करेगा भी नहीं।  हमे इस यज्ञ की विधि मालूम है. … इस यज्ञ के यज्ञ-कुंड में सारे सर्पो के साथ तक्षक भी जल कर भष्म हो जाएगा।।।। 

राजा जनमेजय ने उन्हें यज्ञ की सामग्री जुटाने का आदेश दे दिया….

यज्ञ-मंडप तथा यज्ञ-शाला बनकर तैयार हुए, और राजा जनमेजय यज्ञ के लिए दीक्षित हुए. तभी एक अजीब बात हुई।  किसी कला कौशल के पारंगत विद्वान, अनुभवी, और बुद्धिमान सूत ने कहा ……

"जिस स्थान और जिस समय में यज्ञ-मंडप मापने की क्रिया का प्रारम्भ हुआ है, उससे ऐसा लगता है कि किसी ब्राह्मण के कारण यह यज्ञ पूर्ण नहीं हो सकेगा..........  

ऐसा सुनकर राजा जनमेजय ने द्धारपालो से कहा दिया कि बिना मुझे सुचना दिए, कोई भी पुरुष यज्ञ-मंडप में प्रवेश न कर सके. .

थोड़ी देर सर्प-यज्ञ प्रारम्भ हुआ।  धुंए से लोगों की आँखें लाल हो गयी। काले-काले कपडे पहने, ऋषि-गण जोर- जोर से मंत्रोचार कर रहे थे.

उस समय सारे सर्पों का ह्रदय डर से कांपने लगा। एक दुसरे से लिपटते, चिल्लाते-चीखते बेचारे सर्प आ-आ कर यज्ञ-कुण्ड में गिरने लगे. उनके जलने की दुर्गन्ध चारो तरफ फ़ैल गयी और उनके चिल्लाहटों से सारा आकाश गूँज उठा।।।

यह समाचार तक्षक ने भी सुना। वो भयभीत होकर देवराज इंद्र के पास गया और कहा…

देवराज!! मैं अपराधी हूँ।  भयभीत होकर आपकी शरण में आया हूँ। आप मेरी रक्षा करिये।।।।।

इंद्र ने प्रसन्न हो कर कहा

मैंने तुम्हारी रक्षा के लिए पहले से हीं से ब्रह्मा जी से अभयवचन ले लिया है। तुम्हे सर्प यज्ञ से कोई भय नहीं। तुम दुखी मत हो। 

इंद्र की बात सुनकर तक्षक आनंद से इंद्रभवन में हीं रहने लगा.……     










Monday, January 12, 2015

तक्षक 2 Episode 12

शौनक जी ने फिर पुछा …

"सुतनन्दन! राजा जनमेजय ने उत्तंक की बात सुनकर अपने पिता की मृत्यु के संबंध में जो कुछ पुछ-ताक्ष की, आप हमे वो बताइये...।।  

उग्रश्रवा जी ने कहा …

राजा जनमेजय ने उत्तंक की बात सुनने  के बाद अपने मंत्रियों से पुछा

" मेरे पिता के जीवन में ऐसी  कौन सी घटना घटी थी, जिससे उनकी मृत्यु हुई!!!"

इस पर मंत्रियों ने कहा

"आपके पिता बड़े पराक्रमी थे . भगवान श्री कृष्ण को उनसे बड़ा प्रेम था. वो पिता के सामान धर्मनिष्ट होकर पुत्रों की तरह अपने प्रजा का पालन करते थे. 

चूंकि कुरुवंश के परिक्षीण होने पर उनका जन्म हुआ था, इसलिए वो परीक्षित कहलाये. उन्होंने 60 वर्ष तक प्रजा का पालन किया, फिर एक दिन वो सारी प्रजा को दुखी कर इस पृथ्वी से चले गये....

इस पर  राजा जनमेजय ने  कहा

" मगर आपलोगों ने प्रशन का उत्तर तो दिया हीं नहीं!!! " मैं तो अपने पिता के मृत्यु का कारण जानता चाहता हूँ ??"

मंत्रियों ने कहा
"महाराज!! आपके पिता भी राजा पाण्डु * की तरह शिकार के बड़े प्रेमी थे. 

उन्होंने एक दिन एक हिरण को बाण मारा और उसका पीछा करते करते बहुत दूर तक निकल गए।  बहुत दूर तक जा कर भी वो उस हिरण को ढूंढ नहीं पाये। वो साठ वर्ष के हो चुके थे, इसलिए थक गए।  

भूखे और प्यासे थे।  उसी समय उन्हें एक मुनि दिखे।  उन्होंने मुनि से पानी माँगा।  परन्तु मुनि  कुछ नहीं बोले। 

 उस समय राजा भूख और प्यास से क्षुबित थे, थके थे, और मुनि को कुछ बोलता नहीं देख, उन्हें गुस्सा आ गया. वो यह नहीं जान पाये की मुनि मौनव्रत पे हैं.

उन्होंने उनके अपमान के उद्देस्य से, धनुष से उठाकर, एक मरे हुए सर्प को उनके गले में लटका दिया. 

मुनि  इस पर भी कुछ नहीं बोले. राजा परीक्षित भी ज्यों-त्यों उलटे पाँव वापस महल में चले आये.

उन मौनी ऋषि शमीक का पुत्र था श्रृंगी।  बड़ा हीं तेजस्वी और महाशक्तिशाली!!  

जब उसने अपने मित्रों से सुना कि राजा परीक्षित ने मौन और निष्चल अवस्था में बैठे ,उनके  पिता का  तिरस्कार  किया है, तो वो क्रोध  से  आग -बबूला  हो गया।  उसने  हाथ में जल लेकर  आपके पिता को श्राप  दिया …

" जिसने मेरे निरपराध पिता के कंधे में मरा हुआ सांप रखा है, उसे तक्षक सांप क्रोधित होकर सात दिनों के अंदर अपने विष से जला देगा। लोग मेरी  तपस्या का बल देखें!!!!


श्रृंगी ने लौट कर यह  बात अपने पिता शमीक ऋषि को बतायी।  उन्हें  यह बात सुनकर अच्छा नहीं लगा।  उन्होंने आपके पास अपने शीलवान और गुणी शिष्य गौरमुख को भेजा।

गौरमुख  ने आपके पिता को यह श्राप वाली बात बतायी और उन्हें सावधान कर दिया.

सातवे दिन जब तक्षक आ रहा था तो उसने कश्यप नामक एक ब्राह्मण को देखा। तक्षक ने पुछा… 

"ब्राह्मण देवता आप इतनी शीघ्रता से कहाँ जा रहे हैं और क्या करना चाहते हैं ??

इस पर कश्यप ने कहा 

"जहाँ आज राजा परीक्षित को तक्षक सांप जलाएगा, मैं वहीँ जा रहा हूँ।  मैं उन्हें तुरंत जीवित कर दूंगा, मेरे पहुँचने पर तो वो सांप जला भी नहीं सकेगा …"


तक्षक  ने कहा 

मैं हीं तक्षक हूँ. आप उसे जीवित क्यों करना चाहते हैं ?? मेरे डंसने के बाद उसे जीवित कर भी नहीं पाएंगे। आप मेरी शक्ति देखिये !!

इतना कहकर तक्षक ने अपना विष सामने एक वृक्ष पे छोड़ा। वृक्ष जलकर राख हो गया। पल भर में कश्यप ने उस जले वृक्ष को दुबारा हरा भरा बना दिया!!

 यह देख कर तक्षक कश्यप की खुशामद करने लगा…" आप क्यों जाना चाहते हैं?? आपको क्या चाहिए??

ब्राह्मण   ने कहा 

मैं तो धन के लिए जा रहा हूँ। ।

तक्षक ने कहा

आप मुँहमाँगा धन मुझसे ले लीजिये  और यहीं से लौट जाइए !!

ब्राह्मण उनसे मुँहमाँगा धन लेकर वहीँ से लौट गया। 

इसके बाद तक्षक छल से आया और उसने अपने महल में बैठे, सावधान , आपके धार्मिक पिता को अपने विष की आग से भस्म कर दिया. 

तक्षक ने हीं आपके पिता को डंसा है, और उसने उत्तंक ऋषि को भी बहुत कष्ट दिया है. आपको जो उचित लगे वो कीजिये। आपके आदेश से हीं, हमने यह दुखद घटना आपको बतायी है।

इस पर राजा जनमेजय ने कहा.…

तक्षक के डंसने से वृक्ष का राख हो जाना और कश्यप को उसका दुबारा हरा भरा बना देना, यह बात आपको कहाँ से मालूम पडी है??

क्योंकि अगर ऐसा है तो कश्यप मेरे पिता को भी जीवित कर सकते थे!!  फिर तो तक्षक ने उनको लौटा कर बहुत अनर्थ किया है !! अच्छा !! मैं इसका दंड दूंगा. पर पहले आप इस कथा का  मूल तो बताइये??

तक्षक ने जिस पेड़ को डंसा था उस पेड़ पे पहले से हीं एक इंसान सुखी लकड़ियों के ढेर के साथ बैठा हुआ था।  यह बात न तो कश्यप को पता थी और न हीं तक्षक को। 

वो भी पेड़ के साथ राख हो गया और जब  कश्यप के मंत्र प्रभाव से जब वो पेड़ दुबारा हरा -भरा हुआ तो वो इंसान भी जीवित हो गया.

तक्षक और कश्यप की बातचीत उसने सुनी थी और उसी ने आकर हमको ये सूचना दी.

अब आप हमलोगो का देखा-सुना जानकार जो उचित लगे , कीजिए.… 





 






 
 



Thursday, January 8, 2015

जरत्कारू ऋषि की कहानी Mahabharata Episode 11

फिर शौनक जी ने पुछा

"आपने जिन जरत्कारू ऋषि का नाम लिया है, उनका नाम जरत्कारू क्यों पड़ा?? उनके नाम का क्या अर्थ है ? और उनसे आस्तिक ऋषि का जन्म कैसे हुआ था ??"

उग्रश्रवा जी ने कहा

जरा का अर्थ होता है क्षय और कारू का मतलब है दारुण, मतलब हट्टा कट्टा। उनका शरीर बहुत हट्टा कट्टा था, जिसे उन्होंने तपस्या करके क्षीण कर लिया था, इसलिए उनका नाम पड़ा जरत्कारू।


वासुकि की बहन भी ऐसी हीं थी. उसने भी तपस्या कर अपना शरीर क्षीण कर लिया था, इसलिए वो भी जरत्कारू कहलाई।


जरत्कारू ऋषि विवाह नहीं करना चाहतें थे।

 उन्होंने बहुत दिनों तक ब्रहमचर्य धारण कर तपस्या की।
वो जप, तप और स्वाध्याय में लगे रहतें और निर्भय होकर स्वच्छंद रूप से पृथ्वी का भ्रमण करते रहतें। 


उनका नियम था, जहाँ भी शाम हो जाती, वो वहीँ रुक जाते।एक दिन यात्रा करते समय उन्होंने देखा कि कुछ पितर नीचे की ओर मुँह किये एक गड्ढे से लटक रहे हैं। 


वो खस का एक तिनका पकडे हुए थे और वही केवल बच भी रहा था। उस तिनके की जड़ को भी एक चूहा कुतर रहा था।


पितृगण निराहार थे, दुबले और दुखी थे।।

जरत्कारू ने उनके पास जाकर पुछा  …
 
आपलोग जिस तिनके का सहारा लेकर लटक रहें है, उसके जड़ को एक चूहा कुतर रहा है, जड़ जब कट जाएगा, तो आप इस गड्ढे में गिर पड़ेंगे। आपलोग कौन हैं!!! और कैसे इस मुसीबत में आ पड़े हैं। मझे आपलोगों को इस तरह देख कर बहुत दुःख हो रहा है. मैं आपकी किस तरह से मदद करूँ !! 

मैं अपनी तपस्या का दसवा, चौथाई अथवा आधा फल देकर भी अगर आपलोगों का इस कष्ट से निवारण कर सकूं, तो मुझे बताये। यहाँ तक की मैं अपने पूरे तपस्या का फल देकर भी आपलोगों को बचाना चाहता हूँ !!!! "


इस पर उन पितरों ने कहा ....

"तपस्या का फल तो हमारे पास भी है। तपस्या के फल से हमारी विप्पति नहीं टल सकती । हम कुल-धर्म परंपरा के नाश  होने के कारण इस गति को प्राप्त हो रहे हैं। हमारे कुल में अब सिर्फ एक हीं व्यक्ति रह गया है, जरत्कारू!! और हमारे अभाग्य से वो भी तपस्वी हो गया है!! वो विवाह नहीं करना चाहता है।

तपस्या के लोभ में उसने हमे इस अधोगति पे पंहुचा दिया है। उसका कोई भाई-बन्धु  पत्नी-पुत्र नहीं  है। इसी कारण हम अनाथों की भाँती इस गड्ढे में लटक रहें हैं ।
और आप जो खस की जड़ देख रहें है, वही हमारे वंश का सहारा है, और वो आखिरी तिनका, हमारे वंश का आखिरी पुरुष जरत्कारू है। ये चूहा महाकाल है, जो धीरे-धीरे इसे कुतर रहा  है। 

अगर तुम हमारी मदद करना चाहते हो, तो, अगर तुम्हे कहीं जरत्कारू दिखे तो उससे कहना, यह महाबली काल एक दिन उसे भी नष्ट कर देगा, और तब हम सब और भी मुसीबत में आ पड़ेंगे।।"


यह सुनकर जरत्कारू ऋषि को बड़ा दुःख हुआ, उनका गला भर आया, और वो गदगद गले से बोले...

"आपलोग मेरे हीं पिता और पितामह हैं, मैं आपका अपराधी पुत्र जरत्कारू हूँ.... "

पितरों ने कहा

"यह बहुत सौभाग्य की बात है कि तुम हमे मिल गए हो। यह बताओ तुमने अभी तक विवाह क्यों नहीं किया है !!"

जरत्कारू ऋषि ने कहा

"मैंने अपने मन में यह दृढ निश्चय कर लिया था कि मैं कभी विवाह नहीं करूंगा। परन्तु अब, आपलोग के कष्ट को देखकर, मैंने ब्रह्मचर्य का निश्चय पलट दिया है। 

अगर मुझे अपने हीं नाम की कोई स्त्री भिक्षा के रूप में मिल जाए,तो मैं उस कन्या से विवाह  कर लूँगा, पर उसके भरण-पोषण का भार नहीं उठाऊंगा ।।

ऐसी सुविधा मिलने पर हीं मैं विवाह करूंगा अथवा नहीं। आप चिंता ना करें। आप के कल्याण के लिए मेरा विवाह अवश्य होगा।
 
ये कहकर वो पुनः पृथ्वी पे विचरने लगे। 

पर एक तो बूढ़ा समझकर उन्हें कोई अपनी कन्या नहीं देता अथवा उन्हें अपने अनुरूप कन्या नहीं मिलती।


इससे निराश होकर एक दिन वो वन में गए और पितरों के हित के लिए तीन बार धीरे धीरे ये बोला ....

"मैं कन्या की आचना करता हूँ।

 जो भी चर-अचर, अथवा गुप्त और प्रकट प्राणी हैं सुने, मैं अपने पितरों के कल्याण के लिए, उनकी प्रेरणा से एक कन्या की भीख मांगता हूँ। जिस कन्या का नाम मेरा हीं हो, जो मुझे दान की तरह दी जाए, और जिसके भरण पोषण का दायित्व्य मेरे उपर ना हो, वैसी कन्या मुझे प्रदान करो।।।। 


वासुकि नाग के नियुक्त सर्पों ने जब ऐसा सुना, तो उन्होंने जा कर नागराज वासुकि को ये बताया, तो नागराज वासुकि चटपट अपनी बहन जरत्कारू को लेकर वहां पहुंच गए।।


जरत्कारू ऋषि ने उनके सामने अपनी बात  दुहराई.....

इसका नाम भी जरत्कारू हीं होना चाहिए और मुझे यह भिक्षा में मिलनी चाहिए और मैं इसका भरण पोषण नहीं करूंगा !!

वासुकि ने कहा

"इसका नाम भी जरत्कारू हीं है, ये मेरी बहन है। इसकी भरण पोषण और रक्षा मैं करूंगा। आपके लिए हीं मैंने इसे अब तक रख छोड़ा है....। "


इस पर जरत्कारू ने कहा

इसका भरण पोषण मैं नहीं करूंगा, ये एक शर्त तो हो हीं गयी। दूसरा और एक सुन लो!! अगर इसने कभी, मेरा कोई अप्रिय काम किया तो मैं इसे छोड़ कर चला जाऊँगा।
 
जब नागराज वासुकि ने उनकी सभी शर्तों को मान लिया।

वो उन्हें अपने महल में ले आयें। वहां उनका विधिवत विवाह हुआ। वो सुख से सर्पराज वासुकि के  महल में रहने लगे। 

उन्होंने अपनी पत्नी को भी यह बता दिया था...

"मेरी रूचि के खिलाफ ना तो कुछ करना, ना हीं कुछ बोलना, वरना मैं तुम्हे छोड़कर चला जाऊँगा !! "


उसके बाद उनकी पत्नी जरत्कारू बहुत ध्यान से उनकी सेवा करने लगी और समय रहते उसे गर्भ ठहर हो गया।


एक दिन शाम में कुछ खिन्न हो कर जरत्कारू ऋषि अपनी पत्नी की गोद में सर रखकर सो रहें थे।  


संध्याकाळ हो चूका था और क्षण भर में सूर्यास्त हुए जाता था। 

ऋषिपत्नी को धर्मसंकट आ गया.....

अगर उठाया तो उनके आराम में विघ्न होगा और सोने दिया तो धर्मलोप!!!

ऋषिपत्नी ने जरत्कारू के आराम के ऊपर उनके धर्मपालन को महत्व दिया और धीरे से बोलीं...

हे भगवन!! उठे और देखें की सूर्यास्त होने हीं वाला है।  अग्निहोत्र का समय है, कृपया संध्या-वंदना के लिए उठे !!

नींद में विघ्न पड़ने पर जरत्कारू ऋषि बड़े गुस्से में उठे। क्रोध से उनके होठ कांपने लगें और उन्होंने बड़े गुस्से में कहा ...

सर्पिनी!! तूने मेरा अपमान किया है! मेरा यह दृढ  निश्चय है कि मेरे सोते हुए कभी भी सूर्यास्त नहीं हो सकता। अब मैं अपने अपमान की जगह में नहीं रह सकता।

इस ह्रदय में कंपकपी पैदा कर देने वाली बात को सुन ऋषिपत्नी बोली.....

"मगर प्रभु मैंने आपके अपमान के उद्देश्य से आपको नहीं उठाया। आपके धर्म का लोप ना हो, यही मेरी दृष्टी थी..."
इस पर जरत्कारू ऋषि बोले

अब मेरा बोला टल नहीं सकता। वैसे भी ये हमारी शर्त में था। अब मैं जहाँ से आया था, वहीँ जा रहा हूँ। तुम अपने भाई से कहना मैं जितने दिन यहाँ रहा, बड़े सुख से रहा....."

यह सुनकर ऋषिपत्नी डरते-डरते दुबारा बोली...

धर्मज्ञ! मुझ निपराध को ऐसे ना छोडिये! आप तो जानते हीं है की मेरे आपके विवाह का एक प्रयोजन था कि हमारे संयोग से एक पुत्र पैदा हो, जो हम सर्पों को राजा जनमेजय के सर्प यज्ञ में बचाएगा। अभी तो मेरे गर्भ से संतान भी नही हुई है आप मुझे क्यों छोड़ कर जाना चाहतें हैं !! कृपया तब तक आप ठहर जाइये..."

इस पर जरत्कारू ऋषि ने कहा


"तुम्हारे गर्भ में एक अग्नि के सामान तेजस्वी बालक है, जो बहुत हीं बड़ा विद्वान तपस्वी होगा ...।।"

इसके बाद जरत्कारू ऋषि वहां से चले गए। 

उनके जाते हीं ऋषिपत्नी ने उनके जाने की बात वासुकि जी को बताई ।

 वासुकी जी को यह सुनकर बड़ा कष्ट हुआ। उन्होंने ह्रदय कड़ा कर पुछा...

"उनके क्रोध के सामने कौन ठहर सकता है!! कहीं मैं उन्हें बुलाने जाऊं और वो मुझे गुस्से में श्राप न दे दे !!

बहिन! भाई को ऐसी बातें बहन से करना शोभा नहीं देता। परन्तु तुम तो जानती हीं हो को तुम्हारे उनके विवाह का एक प्रयोजन था। 

क्या तुम्हारा गर्भ ठहरा है ????

इस पर ऋषि-पत्नी ने उनकी बात दुहरा दी और कहा

"कभी विनोद में भी उन्होंने असत्य नहीं कहा!! ... "

यह सुनकर वासुकि जी बड़े प्रसन्न हुए और बड़े प्रेम से अपनी बहन का स्वागत-संस्कार करने लगे। 

समय आने पे उसके गर्भ से एक दिव्य-कुमार का जन्म हुआ।  

उसके जन्मने से मातृवंश और पितृवंश दोनों का भय जाता रहा। 

बाल्यावस्था में बड़े प्रयत्नो से उसकी रक्षा की गयी और थोड़े हीं दिनों में बालक इंद्र के समान बढ़कर नागो को हर्षित करने लगा।

 क्रमशः बड़े होकर उसने च्व्यन ऋषि से वेदों का सांगोपांग अध्ययन किया। 


चूँकि जब वह गर्भ में था, तो उसके पिता ने उसके लिए "अस्ति"( है ) शब्द का उच्चारण किया था, इसलिए उनका नाम आस्तिक पड़ा।।।।

Tuesday, January 6, 2015

माता का श्राप Episode 10

शौनक आदि ऋषियों ने तब उग्रश्रवा ऋषि से यह पुछा…

सुतनन्दन! जब सर्पों को पता था कि उनकी माता ने उन्हें ऐसा भयानक श्राप दे दिया है तो उन्होंने अपने बचाव में क्या किया!!

उग्रश्र्वा जी ने कहा

उन सर्पों में एक शेषनाग भी थे।शेषंनाग शुरू से हीं धार्मिक प्रवृति के थे.....

उन्होंने कद्रु और अन्य सर्प भाइयों का साथ छोड़ दिया। और अन्नजल त्याग, केवल हवा पी कर उन्होंने बहुत वर्षों तक बड़ी कड़ी तपस्या की. अपनी सारी इन्द्रियों को जीत वो गन्धमादन,  बद्रिकाश्रम, गोकर्ण, और हिमालय आदि की तराइयों में एकांतवास करते। उन्होंने अनेको तीर्थस्थलों की भी यात्रा की.

उनकी इस घोर तपस्या को देख एक दिन ब्रह्मा जी उनके पास आये और कहा.....

"इस तरह इतनी घोर तपस्या करके तुम जगत के लोगों को ऐसा संताप क्यों दे रहे हो? कोई और प्रजा की भलाई वाला काम क्यों नहीं करते!! आखिर तुम्हे क्या चाहिए??? … "

शेषनाग ने कहा

" हे भगवन मेरे सभी बड़े मुर्ख हैं. मेरा मन उन सर्प भाइयों की कुटिलता से बड़ा दुखी हो गया है. मैं उनसे दूर रहना चाहता हूँ. गरुड़ मेरे भाई हैं,  मैं उनसे स्नेह रखता हूँ. मैं तपस्या करके अपने इस शरीर को त्याग देना चाहता हूँ. परन्तु मुझे डर है की कहीं मृत्यु के बाद भी ना मुझे, अपने भाइयों के साथ हीं रहना पड़े !! मैं धर्मनिष्ट रहना चाहता हूँ ....।।"

यह सुनकर ब्रह्मा जी ने कहा

तुम्हारे भाइयों की करतूते मुझसे छिपी नहीं हैं. वैसे भी माता की आज्ञा का उलंघन करके, वो संकट में पड़ हीं चुके हैं!! अस्तु! मैंने उसका भी परिहार सोंच रखा है. तुम उनकी चिंता मत करों। मैं तुमपे प्रसन्न हूँ , क्योंकि सौभाग्यवश तुम्हारी बुद्धि धर्म में अटल है।  तुम मनचाही वस्तु वर में मांग लो.…"

तब शेषनाग ने वर माँगा …

"हे पितामह! आप मुझे ऐसा वर दीजिये , जिससे मेरी बुद्धि सदा धर्म, तपस्या और शान्ति में सलंग्न रहे.… !!"

ब्रह्मा जी ने कहा

"ऐसा हीं हों!!!  और मैं तुम्हारे इन्द्रियों और मन के संयम से प्रसन्न हूँ, तुम मेरा एक काम करों, यह पृथ्वी बड़ी हिलती डुलती रहती है*, तुम इसे धारण कर लो जिससे यह अचल हो जाये. …"


इस पर शेषनाग जी ने कहा। …

"आप प्रजा के स्वामी हैं, मैं आपकी ज्ञान का पालन करूंगा, आप इस पृथ्वी को मेरे सर के ऊपर रख दीजिये..."

ब्रह्मा जी कहा

"शेष!! ये पृथ्वी में तुम्हे मार्ग देगी। तुम उसके अंदर घुस जाओ. इस पृथ्वी को धारण करके तुम मेरा बड़ा प्रिय कार्य करोगे....."

ब्रह्मा जी के आज्ञानुसार वो पृथ्वी के भू-विवर में प्रवेश कर गए और समुद्रों से घिरी इस पृथ्वी को चारो और से पकड़ कर अपने सर पे उठा लिया।

 ब्रह्मा जी उनके धर्म, धैर्य और शक्ति की प्रसन्नता कर वापस चले गये।


उधर सर्पों के सबसे बड़े भाई वासुकी नाग को भी माता के श्राप से बड़ी चिंता हुई और वो इसका प्रतिकार सोंचने लगे।  उन्होंने सलाह के लिए सभी भाइयों को इकट्ठा किया और कहा ….

"माता ने हमे श्राप दे दिया है। हमे उसके निवारण के बारे में सोंचना चाहिए। सारे श्रापों का प्रतिकार संभव है पर माता के श्राप का कोई प्रतिकार दिखाई नहीं पड़ता। हमे अब व्यर्थ समय नहीं गंवाना चाहिए, विप्पत्ति आने से पहले हीं उपाय करने से काम बन सकता है..... "

तब "ठीक है, ठीक है " कहकर सभी बुद्धिमान और चतुर सर्प विचार करने लगे.…

कुछ नागो ने कहा " हमलोग ब्राह्मण बनकर जनमेजय से यह भिक्षा मांगे कि वो ये यज्ञ न करे" कुछ ने कहा "हम मंत्री बन कर ऐसी सलाह दे की यज्ञ हीं न होने पावे.… " किसी ने कहा "उनके पुरोहित को हीं डंस कर मार देतें हैं, पुरोहित के मरने से यज्ञ अपनेआप रुक जायेगा .… "

इस पर धर्मात्मा और दयालु सर्पो ने कहा

राम-राम!! ब्रह्महत्या तो महापाप है। संकट से समय धर्म की रक्षा से हीं रक्षा होती है ।

कुछ नागों ने कहा

" हम बादल बनकर यज्ञ की अग्नी को हीं बुझा देंगे"

कुछ बोले "हम यज्ञ की सामग्री चुरा लायेंगे "

कुछ ने कहा "हम लाखों लोगों को डंस लेंगे "

इसके बाद सर्पों ने कहा  

"वासुके! हम तो यही सब उपाय सोंच सकते हैं? आपकी जो इच्छा लगे, अति शीघ्र करें।।।"

इस  पर वासुकि जी ने कहा..... 

आप लोगों की सलाहें अव्य्व्यहारिक  हैं। हमलोग चलकर अपने पिता कश्यप ऋषि से हीं इसका निवारण पूछते हैं। 

उनमे एक एलापत्र नामक नाग था,  उसने आगे  आकर कहा… 

"जमेजय का सर्प यज्ञ  रुकना असंभव है. इस विप्पती  का जो निवारण है , वो मैं बताता हूँ. जब माता  ने यह श्राप दिया था, उस  समय  मैं  डरकर  उन्हीं की गोद में छुप गया था. माता का  श्राप सुनकर उस वक़्त वहां ब्रह्मा जी आये और उन्होंने कद्रु के प्रशंसा की.... इस पर देवताओं  ने कहा..

'भगवन !  कठोरहृदया कद्रु  के सिवा और कौन ऐसी माता होगी जो अपने पुत्रों को हीं ऐसा श्राप दे दे और  आप इसका अनुमोदन हीं  करते हैं !! ऐसा क्यों है??  

इस पर ब्रह्मा जी ने कहा 

" देवगण! इस समय जगत में सर्प बहुत बढ़ गए हैं . वो डरावने, विषैले और क्रोधी स्वभाव वालें हैं। प्रजा के हित के लिए हीं मैंने कद्रू को नही रोका।। इस शाप से सर्फ क्रोधी विषैले और पापी सर्पों का नाश होगा, धर्मात्मा  सर्प सुरक्षित रहेंगे। यायावर  वंश में जरत्कारू नामक  ऋषि होंगे जिनके पुत्र आस्तिक इस यज्ञ को बंद करा देंगे ...."
देवताओं  के और पूछने पर ब्रह्मा जी ने ये बताया कि  जरत्कारू की पत्नी का नाम भी जरत्कारू हीं होगा और वो सर्पराज वासुकि की  बहन होगी।।।। 

".....तो सर्पराज वासुकि आपकी बहन जरत्कारू का विवाह जरत्कारू ऋषि से हीं होना चाहिए और जब भी जरत्कारू ऋषि भिक्षा में अपनी बहन का हाँथ मांगे आप उसी समय अपनी बहन उन्हें  दे दे ।।। "

एलापत्र के  ऐसा कहने पर सभी सर्प "ठीक है, ठीक है"  कहकर  प्रसन्नतापूर्वक अपने-अपने रास्ते चले गए और 
उसी दिन से सर्पराज वासुकि बड़े प्रेम से अपनी बहन जरत्कारू की रक्षा करने लगें । 

थोड़े दिनों के बाद समुन्द्र मंथन हुआ , जहाँ वासुकि ऋषि ने मंथन की नेति (रस्सी) बनना स्वीकार किया। उस समय उन्होंने देवताओं से ये एलापत्र वाली बात पूछी। इसपर देवता  वासुकि जी को ब्रह्मा जी के पास ले गए, और ब्रह्मा जी से वही बात दुबारा कहलवा दी.......


उसके बाद उन्होंने सारे सर्पों को जरत्कारू जी का पता  लगाने में लगा दिया और कहा 

"जैसे हीं आपको पता चले की जरत्कारू ऋषि विवाह करना चाहतें  हैं ,आप मुझे तुरंत इसकी सूचना दे । "







  




















      


Monday, January 5, 2015

जिसका यह पंख है..... Episode 9

परम पराक्रमी पक्षिराज गरुड़ फिर बड़ी वेग के साथ अमृत के स्थान में प्रवेश  करते हैं और देखते हैं कि एक बड़ा भारी लोहे का चक्र निरंतर अमृत कलश के चारो और घूम रहा है.

गरुड़ जी ने अत्यन्त सूक्ष्म शरीर धारण किया और वो चक्र के आरो के बीच से उसके अंदर प्रवेश कर गए.

वहां अमृत कलश के रक्षा के लिए दो बड़े भयंकर सर्प नियुक्त थे. उनकी लपलपाती जीभें, चमकीली आँखें और अग्नि की सी शरीर-कान्ति थी.

गरुड़ जी ने अपने चोंचों और पंजो से उन सर्पों को लहु-लुहान कर दिया और अपने परों को फैला कर उन्होने चक्र को चूर-चूर कर दिया.

फिर उन्होंने अमृत कलश अपने पंजे में उठाया और बड़ी वेग से आकश मार्ग में उड़ चले. उन्होंने स्वयं अमृत नहीं पीया। बस उसे लेकर सर्पों की तरफ उड़ चले . .… 

 उन्हें आकाशमार्ग में भगवान विष्णु के दर्शन हुए।।  भगवान ने कहा.....

"गरुड़ तुम्हारे अंदर खुद अमृत पीने की इच्छा नहीं है, यह देख मुझे बड़ा आश्चर्यजनक हर्ष हुआ. मैं तुम्हे वर देना चाहता हूँ. तुम मनपसंद वस्तु मांग लो....."

गरुड़ ने कहा

"तो भगवान एक तो आप मुझे अपनी ध्वजा में रखिये और दूसरा मैं बिना अमृत पीये अमर हो जाऊं … !!" 

 भगवान बोले

"तथास्तु"

तब गरुड़ जी बोले ....

"भगवान मैं भी आपको वर देना चाहता हूँ, आप भी मुझसे कुछ मांगिये… ।"

भगवान विष्णु ने कहा

"तुम मेरे वाहन बन जाओ "

गरुड़ ने कहा

"ऐसा हीं होगा…" और उनकी आज्ञा लेकर उन्होंने अमृत के साथ आगे की यात्रा  की.....

उधर तब तक इंद्र को होश आ चुका था, और उन्होंने बड़े क्रोध में अपने वज्र से गरुड़ पे प्रहार किया.

गरुड़ वज्राघात होते हुए भी हँसते-हँसते बोले …… 

"हे इन्द्र! तेरे वज्र की शक्ति से तो नहीं लेकिन जिनकी हड्डियों से यह वज्र बना है, उनके मान के लिए मैं अपना एक पंख गिराये देता हूँ.. ..।"   

उस पंख को देख कर लोगों को बड़ा हर्ष हुआ और सबों ने कहा.…

"जिसका यह पंख है उस पक्षी का नाम सुपर्ण हो…।"

 इंद्रा को बड़ा आश्चर्य हुआ.....

वो उनके पास गए और कहा

"हे पक्षिराज!! आपने में कितना बल है!!! मुझे बताएँ!!  और साथ हीं मैं आपसे मित्रता भी चाहता हूँ.…

और आप खुद तो अमृत पीते नहीं, अगर आपको इसकी जरूरत नहीं हो तो आप कृपया ये मुझे दे दें क्योंकि आप जिन्हे ये अमृत देना चाहते हैं, उन्हें अमृत मिलने से वो हमे बड़ा कष्ट देंगे.... "

गरुड़ जी ने कहा

"देवराज!! अमृत को ले जाने का एक कारण हैं!!!! मैं इसे किसी को पिलाना नहीं चाहता, मैं इसे ले जाकर जहाँ भी रखूँ, वहां से आप इसे उठा ले आइएगा….।  " 

देवराज उनकी बात से संतुष्ट हो गए और उन्होने गरुड़ जी से वर माँगने को कहा.……

गरुड़ सर्पों के छल से बड़े दुखी थे… उन्होंने उन्हें हीं अपना आहार बनाने की सोंची और वर माँगा   …

"ये सर्प हीं मेरा आहार बने।। "

इंद्रा ने कहा "ऐसा हीं हो। "

इस तरह से गरुड़ अमृत लेकर सर्पों  के पास पहुंचे और वहां उनकी माता भी थी. वहां पहुँचकर उन्होंने प्रसन्नतापूर्वक यह कहा.… 

" लो!! मैं अमृत ले आया, मगर इसे पीने में ऐसी जल्दी भी ना करो और पहले  स्नान करके पवित्र हो जाओ, तब तक मैं इसे यहीं इस कुश पे रखे देता हूँ.…

और अब तुमलोगों के कथनानुसार मैं अमृत ले आया हूँ, इससे मेरी माता अब तुमलोगों के दासत्व से मुक्त होती है.… "

सर्पों ने स्वीकार कर लिया और वो बड़ी प्रसन्नतापूर्वक स्नान के लिए चले गयें, तब तक इंद्र वहां से अमृत-कलश उठाकर स्वर्गलोक चले गये…

जब सर्प नहा कर लौटे तो उन्होंने देखा की अमृत कलश वहां पे नहीं है, तो उन्हें लगा की जो छल उन्होंने विनीता के साथ किया था, आज उन्हें उसी का फल वहां मिला है....

फिर उन्होंने सोंचा की अमृत कुश में रखा गया था तो हो सकता है उसका कुछ हिस्सा उसमे लग गया हो, और वो उन कुशों को हीं चाटने लगे, जिससे उनकी जिह्वा दो भागो में बट गयी। ।

चूंकि अमृत को कुश के ऊपर रखा गया था इसिलए उस दिन के बाद से कुश को पवित्र माना जाने लगा।।।।